ख़्वाब जो आँखों में थे वो सब फ़साने हो गए-GAZAL SALIM RAZA REWA

ग़ज़ल GAZAL
ख़्वाब जो आँखों में थे वो सब फ़साने हो गए
मुश्किलें  आई  तो अपने भी बेगाने हो गए 

आज भी उनकी अदायों  में वही है शोखियाँ 
क्या हुआ जो जिस्म  के कपडे पुराने हो गए 

पास रहते हैं मगर कुछ इस तरह अन्जान से 
जैसे मिलकर भी मिले हमको ज़माने  हो गए 

आप की यादों में खोकर जो कही मैंने ग़ज़ल 
वो ग़ज़ल तेरी मुहब्बत के फ़साने हो गए 

याद को तेरे सजोकर दिल में जबसे  रख लिया 
ज़िन्दगी हर  रात प्यारी  दिन सुहाने  हो गए 

कल तलक हम मालिको मुख़्तार तख्तो ताज थे
आज यूँ टुटे ”रजा” की बे ठिकाने हो  गए 

shyar salimraza rewa