भेड़ और भेडिये

भेड़ो ने भेड़िए चुने भेड़िए भेड़ो को ही चाप गये,

चपी भेड़े अपनी औलादो को दे भेड़ियों का ही अभिशाप गये,

राष्ट्र भाव से शून्य अभिशप्त, भेड़ों का अब साम्राज्य यहाँ,

हो उठें उग्र, सिंहों मे इतना साहस आज कहाँ,

ये कथा नही पंचतंत्रो की  है, बूढ़े भारत की यह कहानी है,

नपुंसक शासन की मिली राष्ट्र को, अनमोल निशानी है,

शौर्य, पराक्रम, साहस का भारत मे जैसे हि अवसान हुआ

वंचक शृन्गाल, गिद्ध और शूकर सत्ताओं की शान हुआ,

देख भीष्म को शरशय्या पर श्वनो को संज्ञान हुआ,

राष्ट्र पतन का कारक था जो, जाहीलों का भगवान हुआ,

ढोर डांगरो के कोलाहल मे,

सिंघ गर्जना का स्वर कहाँ अब टिकता है,

अधिकारो की बातें करने वाला भिखमंगे सा हि दिखता है ,

जो देखे कागज छाप दे अंगूठा, भारत का भाग यहाँ पर लिखता है,

दो “बोतल” दो “गाँधी” मे ये महा लोकतंत्र,

हर चौराहे पर बिकता है,

हो गया खेल गंभीर मुद्दा, गंभीर मुद्दों का होता यहाँ, पर खेल है,

कायर जनशासन का विश्व मे, भारत सा न मिलता मेल है,

मत कहो ये बदला भारत है, भारत का भाग यहाँ पर बदल गया,

कोमल पीटक निकायों मे महभैरव का राग यहाँ पर बदल गया,

कर सको तो ये महेसुस करो कोन भारत पतन का भागी है,

क्यूँ सिंघ पल रहा पत्तों पर, क्यूँ माधव हुआ विरागी है ,

आज चारो और फेला स्वतंत्रता का जोश यहाँ,

किंतु स्वराज की हत्या का नही किसी को होश यहाँ,

आज़ादी… आज़ादी का आधार रक्त है, भारत अब भी समझ नही पाया है,

परतंत्रता के कुएँ से खींच, भारत को श्वान तन्त्र तक लाया है,

आज फिर दिख राहा चतुरदिक फैला मृत्यूपाश यहाँ,

मूक दर्शक बन देख रहा पौरुष, भारत का सत्यानाश यहाँ,

डूबे हुए है सब आज यहाँ झूठे स्वराज के उन्माद मे,

देखो कीड़े लग रहें है, बलिदानो की खाद मे,

फेला हुआ है भ्रमजाल यहाँ, खोखली स्वतंत्रता के हर्ष का,

और दूर गगन मे, हंस राहा विध्वंसकारी सुर्य भारतवर्ष का !!!

3 Comments

  1. ganesh dutt ganesh dutt 25/01/2013

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