स्नेह-डोर

बदलों के पार बसाने संसार,
तुम मुझे क्यों बुलाते हो?

तारों के मंडप में किरणें के तार,
स्वागत में मेरे तुम क्यों सजाते हो?

किरणों के डेरे में प्यार के घनेरे में,
इशारों से मुझे पास क्यों बुलाते हो?

धरा की उष्मा है मेरे चहुँ ओर,
पिघल न जाये कहीं तुम्हारी स्नेह डोर

मायावी चित्र मेरे हृदय- पटल पर
अपने स्नेह-रंगों से तुम क्यों सजाते हो ?

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