इच्छा

न हम अपनी इच्छा से यहां इस दुनियां में आए हैं

न हम अपनी मर्जी से इस दुनियां से लौट पायेंगे

फ़िर क्यों इच्छाओं के सागर में हम इतना डूब जाते हैं

सुख की चाहत में सैंकडों ठोकरें खाते-खाते

अपनी ही परछाई के पीछे हरदम भागते-भागते

क्यों चैन से हम बैठ नहीं पाते़ …………………..! कश्मीर सिहँ

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