चिडिया

चिडिया

खुस है शिकारी
गिराकर जोडे पन्छी  मे से
एक को
पर एहसास नही उसे
उस पीडा कि
जो दुसरा पन्छी झेल रहा है
मै सुन रहा हुँ
ची …..ची ……..ची
लगता है शिकारी कि बाण
मेरे हृदय मे धस गई है
और मै
पेरेलैसिस से ग्रस्त हुँ
असमर्थ हुँ
असहाय हुँ
यहि हो रहा है आज
यहा घात लगाए बैठे है शिकारी
यह  एक्किस्वी सदी
जो  बिसवी सदी कि दहलिज
अभि अभि  पार कि है
रो रहा है
डाल डाल पर
फुदक फुदक कर
ची ……ची ……ची ……
पहुच गया है आदमी चाँद पर
क्या नही किया आज उसने
मनुष्य बनाचुका है
एटम बम ,अणु बम
क्या किया तो उसने ?
एक दुसरे को लुट रही है
भौतिकबाद
एक दुसरे से घृणा कर रही है
आध्यात्मबाद
यहा बोलनेवाले गुंगा बने बैठे है
और मानवता अटक गई है
बन्दुक कि नाल मे
बेसहारा चिल्लारहि है
ची ………ची …….ची ……….
सुलग रही है शहर
शमशान कि तरह
अपनो ने हि लुटा आबरु
द्रोपती कि तरह
भाइ भाइ कि छाती मे
कृपाण चलाती है
यहाँ तो दुध  भी
लहु सी नजर आती है
और शराफत डुबने लगि है
चुल्लुभर पानि मे
चिल्लारहि है
ची ……ची …….ची ………
हरि पौडेल 
 

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