तीन-पंक्तियाँ

“माहिया” नामक शैली से तीन पंक्तियाँ मे कविता लिखी गई है,

(1)
तीन पंक्तियों के मेल,
सजन ‘का ’ खेल;
आप सब बिठाएं ताल-मेल।
(2)
हवा वासंती चली,
रंग फिज़ा मे खिला;
यादें भी हुइ रंगीली।
(3)
पालनहार प्रभु मेरे;
तेरी दया को तरसे,
तुम ही तो हो मेरे|
(4)
अदा है दिल तोड़ना,
टूटने पे भी प्रिया;
तेरी अदा से जुड़ गया!
(5)
आ कर चले जाना,
बहाना है पुराना;
याद अपनी साथ ले जाना!
(6)
सुख- दु:ख आते जाते;
दोनो बे-असर,
धर्य जो रख पाते|
(7)
सोच अब हो गई बेमानी,
अब रिश्तों में;
दरिया मे जैसे बहता पानी।
(8)
सावन की हरियाली सा;
पिया घर लोट आये,
तन सजनी का निखरा।
(9)
सावन मे झूमे-नाचे,
मन बादल सा;
झम-झमा-झम बरसाए।
(10)
होनी तो है बलवान,
चिंता-चिता समान;
होता है जो विधी-विधान।
(11)
तुम जो मस्कुराए,
खुशबू- सी फ़ैली;
कलियाँ खिल-खिल जाये|
(12)
यह बात कहाँ रुकती,
देर तक सताती;
तुमने ही वादा खिलाफ़ी की।
(13)
नस नस में शिहरण,
स्पर्श मन-मोहन,
चंचल सा चित्तवन!
(14)
कैसे कैसे हालात हुए,
जब ख्यात हुए;
अच्छा था ‘कुख्यात’ थे।
(15)
कट जाए मन का अँधियारा,
खोलो विवेक नयन;
मन में हो जाए उजियारा।
(16)
दो औ‘ दो पाँच जब,
सच होते अब;
दावं-पेच के हिसाब सब।
(17)
वो पल कभी नहीं आए,
भ्रमित मन ने;
सोच-सोच मे व्यर्थ खोए।
(18)
हम मोम से पिघल गए,
फिर मुलाक़ात मे;
चहरे के ऊर्जा-तेज़ से।
(19)
सागर गहरा,है खारा;
नदिया मीठी बहती,
बहाव मे सब वारा|
(20)
काँटों मे भी कलियाँ,
कहतीं-झूमेंगे;
मस्ती की रंगेलियाँ |

सजन कुमार मुरारका

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