कुछ जिंदगी में हमारी तुम इस तरह आए

कुछ जिंदगी में हमारी तुम इस तरह आये
चाहते हुए भी हम खुद को रोक न पाए|
है ये तेरा जलवा या कदम हमारे थे लड़खड़ाए ||

आइने में खुद को देखे, तो हैं कम कुछ हम भी नहीं,
रति भर की शायरी है बाकि का गम नहीं |
शबो-रोज़ जगता हूँ कुछ लिखने की कोशिश करता हूँ
शफ़क़ पटल पर तेरी सूरत देखा करता हूँ
हो जब से जिंदगी में तुम मेरे आये ||

एक जद्दोज़हद सी छिड़ी है इस दिल में
जब से जिंदगी में तुम मेरे आये |
नसीम सबा जफ़ा ढ़ाने को आमादा है
सर्द रात में खुले च-र्ख तले, सूरत तेरी आँखों में बसाये,
सदा-ए-दिल इस्रार कर रहा है-
क्या ये इश्क़ है या हो तुम लेखनी हमारी ||

जब से जिंदगी में तुम मेरे आये,
दिल के ज़ज्बात हरफ बन के उभर आते है
चाहते हुए भी हम खुद को रोक न पाते हैं

Leave a Reply