बाप की हार बेटे से हो जाती है

विज्ञान के छात्र ने, कुत्ते की पूंछ से कुछ गाया।
बाप बोला बेटा, तू कुत्ते की पूंछ क्यों ले आया।
छात्र बोला पिताजी, नहीं है, ये कुत्ते की पूंछ।
एक आदमी हार गया हैं, बहस में अपनी मूंछ।
बात-बात में छिड़ गई, बहस पिता-पुत्र में भिड़ गई।
पिताजी बोले राजनीति जानते हो? धर्म को मानते हो?
राजनीति में, अध्यक्ष बनता जैसे गुण्डा गैंग का दादा।
धनीराम कोषाध्यक्ष मंत्री चापलूस, फर्श बिछाता सादा।
इतिहास तो सोने का है, धर्म सिर्फ रोने का है।
मै एक धर्म जानता हूं,देश को सर्वोपरि मानता हूं।
पिताजी ने कहा, चंचलावान दुनियां में केसे जीओगे।
गमों पर गम आयेंगे, इतने सारे आंसू कैसे पीओगे।
बेटा बोला, मै भारतीय, गमों में जीने आया हूं।
मुझे गर्व है, कि मै, एक भारतीय का जाया हूं।
विज्ञान के छात्र का मन डोला, पिताजी से बोला।
सिद्ध करके बताइए, आप ही मेरे पिता समझाइए।
पिताजी ने डण्डा उठाया, दिमाग में प्रश्न कैसे आया।
क्या पागल है क्या, मेरी बेइज्जती करने चला आया।
छात्र बोला विज्ञान की छात्र हूं, बात सिद्ध मानता हूं।
आप ये सिद्ध नहीं कर सकते, अच्छी तरह जानता हूं।
मुझे प्रश्न पूछने का हक नहीं? आप ही पिता शक नहीं।
मानूगां तभी जब सिद्ध करदेंगें, नेताओं सा पेटा भर देंगे।
जैसे सत्ता के लिए वे बेचारे,उन्हें लालच में झपकाते हैं।
अति अल्पमत पर भी , गददी के लिए लार टपकाते हैं।
अरे लाला, तुम्हारे दिमाग का निकला दिवाला।
नेताओं की बात पकड़ते हो , बाप पर अकड़ते हो।
अरे ये नेता अपने, बाप पर उंगली उठा सकते हैं।
वोट की खातिर ये पूरे देश को भी भुना सकते हैं।
इन्होंने लाखो को मरवाया, मुददा इन्होंने बनाया।
लाशों पर बैठकर, गन्दी-गन्दी राजनीति करते हैं।
रात में मरवाते हैं,दिन में आंसुओं से पेटा भरते हैं।
छात्र बोला, भाषण मत देते जाइए, मूल पर आइए।
पिताजी ने कुण्डली बिछाई, अस्पताल चिट दिखाई।
गवाह पेश किए मां बहन ,भाई, फिर कसम खाई।
छात्र बोला, अस्पताल की चिट अर्जी भी हो सकती है।
जन्मकुण्डली तो सौ रुपये में भी फर्जी जो सकती है।
क्या गारण्टी है मैं, अस्पताल में बदला नहीं हूँ,
क्या गारण्टी है, फरेबी प्यार का गदला नही हूँ।
क्या पैदा करने से पूर्व, पालने पर ध्यान दिया।
कैसे मानूं कि आपने , किसी से गोद न लिया।
समाज में स्थान बनाना है, पुत्र सिद्ध बताना है।
युगों पूर्व की बातों को लोग सिद्ध कर रहे हैं।
एक आप हैं, जो वास्तव में मेरे ही तो बाप हैं।
फिर भी न जाने क्यों सिद्ध करने से डर रहे हैं।
सुनकर भूचाल आ गया, पिताजी चक्कर में पड़ गये।
मन ही मन तय कर डी0एन0ए0 टैस्ट पर अड़ गये।
मगर रिपोर्ट कहीं गड़बड़ हो तो, सोच पंचर हो गये।
नैगटिव पाजिटव के अंजाम में पूरे के पूरे खो गये।
पिताजी का छूटा पसीना, सोचा दूभर होगा जीना।
बाप को जोश आया, सच्ची बात से होश आ गया।
बोला बेटा, तेरा बाप हूँ बस मान ले, अपने आप हूँ।
तूने आंखें खोल दी मेरी, मैं धरती पर अभिशाप हूँ।

मैं धर्मान्ध हूँ, भोलों की बस्ती को जलाकर आया हूँ।
बस्ती जलाकर, एक सम्प्रदाय से प्रमाणपत्र लाया हूँ।
मैं भारतीय होकर, भारतीयता सिद्ध नहीं कर पाया हूँ।
तुझे क्या बताऊँ मुझे नहीं पता, मैं किसका जाया हूँ।

इस तरह सम्प्रदायी लाल, भारतीयता में खो गये।
नाम बदलकर, सम्प्रदायी से भारत सिहं हो गये।
बोले बेटा तेरे, खिलौने में, मैं मूंछे नहीं सटाऊॅगा।
जरूरत पड़े मेरे देश को, तो सिर में कटाऊॅगा।

3 Comments

  1. gudiya tyagi 01/01/2013
  2. पं जी एल चौरसिया 05/01/2013
  3. पं जी एल चौरसिया 18/01/2013

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