परवाने मेरे नज़दीक आना

न परवाने मेरे नज़दीक आना

नहीं मैं चाहती तुझको जलाना

 

बहुत भोला बहुत नादान है तू

अभी तुझको बहुत कुछ है सिखाना

 

मेरे आगोश में गरमाई तो है

मगर ये मौत का भी है ठिकाना

 

ज़रा रखना कदम तू सोच करके

मुहब्बत बन न जाए इक फ़साना

 

हुआ जो राख है फिर याद उसको

ख़लिश करता नहीं ज़ालिम ज़माना.

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