घुटन

घुटन
आज फिर चिडिया चहचहाने लगी है
कल शाम जो जिन्दगि खो दिया था मैने
आज फिर उसे पाया हूँ
कल क्या होगा किसे पता ?
सदियो से यहि होती आ रही है
कोइ निचुड़े जा रहा है
कोइ निचोडे जा रहा है
क्या सचमुच जीन्दगी जी रहे है हम ?
या जिनेका ढोंग कर रहे है

अपनी पैरो कि पपड़िया मे
मै इतिहास खोद रहा हुँ
अन्दर हि अन्दर कुच मिचला रहा है
कहिँ कोइ अपना सा दिखाई नही देता
कत्तै कोइ अपनत्व नही
सिर्फ जिल्लत बेबसी और झिड्कन
फरक कुछ नही उस चौपाया से
बस मै घास नही खाता
फिर भी हम मनुस्य कह्लाते है
स्वभाव बस इस मनुस्य को भी
जब घृणा व आक्रोस होने लगती है
तम मै खुद को पत्थर तोड़ते हुए पाता हुँ
माथे पे आई तरल पदार्थ कि
जब भिनी भिनी सुगन्ध आती है
तब मै मदहोस हो जाता हुँ
अब तो इस बुं कि मै इरिकटेड हो गया हुँ
लो फिर शाम ढल्ने लगी
आज जो जिन्दगि पाया था मैने
एक बार फिर उसमे ठहराव आ गया है
एक बार फिर लम्बी सासे लेकर
लम्बा होने को मिला है
यहि वो क्षण है जब कुछ
सुख कि अनुभूति होती है
आज जो जिन्दगि जिया था मै ने
एक बार भिर उसमे सुन्यता आई है
रही कल कि बात
तो फिर कल सहि

हरि पौडेल

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