कविता-मकरंद की मिठास

मुझसे किसी ने कहा
कविता है
पार्थिव शब्दों का संसार
मैं नहीं मानती
इन शब्दों में भरी है
मकरंद की मिठास
सुमन की गंध की महक
प्रिया के श्रंगार का
रोमांच भरता संसार
प्रियतम के हाथों का स्पर्श
इन शब्दों में बसी है
मां का ममता
बहन का प्यार
पिता की छांव
भाई का सहारा
दुखों की वेदना
रूदन की करूण पुकार
ईश्वर का सत्य
मानवता की परिभाषा
पार्थिव नहीं हैं शब्द
इन में बसते हैं प्राण
भावनाओं के
सांसें चलती हैं
प्यार की
लहू दौड़ता है
एहसासों का
ढांचा है
यर्थाथ का
ह्रदय स्थल है
यादों का
यहां मौन होता है मुखरित
शांत स्वर से
जो करते हैं चीत्कार
अपनी पीड़ा की
ये घुलना चाहते हैं
सुरीले शब्दों में
झूलना चाहते हैं
प्रेम का झूला
हिलोरों में खेलना चाहतें हैं
सागर की
आती-जाती लहरों की भांति
उड़ना चाहते हैं
पवन के संग
अंतिम छोर तक
नहीं बंधना चाहते
सीमाओं के घेरे में
काटना चाहते हैं
समस्याओं का जाल
नहीं बिंधना चाहते
माला के सीमित दायरे में
गुंथना चाहते हैं
प्रकाश की किरणों में
बसना चाहते हैं
इंसानियत की नीड़ में
करना चाहतें हैं प्यार
इंसानों से
झड़ना चाहते हैं मुखारविंद से
फूल बनकर
भरना चाहते हैं
गरीबों की झोली
देना चाहते हैं विश्वास
मां की टूटती आस को
हर भाव के भागीदार होते हैं
ये पार्थिव शब्द
शब्द ही प्राण भर देते हैं
डूबते मन में
टिमटिमाते दिये को
रोशन कर देते हैं
सूर्य के प्रकाश से
छिपना चाहते हैं सीप में
ताकि खिल सकें
मोती बनकर
डूबना चाहते हैं
सागर की गहराई में
ताकि पा सकें उसकी थाह
निकाल सकें रत्न
और जड़ सकें
भावनाओं के अम्बर पर
बसना चाहते हैं
बाल मुस्कान में
माटी की भीनी सुगंध में
ब्रह्माण्ड के शून्य में
मंदिर-मस्जिद की प्रार्थनाओं में
और फिर…
शब्दों की किलकारी से
गूंज उठती है
बंजर भूमि की कोख
जहां लहलहाती है
विश्वास की फसल

2 Comments

  1. rakesh kumar rakesh kumar 23/05/2015
  2. वीना 27/11/2015

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