बरसों बाद


डॉ०भावना कुँअर

बरसों बाद

मेरे मन आँगन

महका प्यार

झूम उठा आसमां

खिला संसार।

मन की कलियाँ भी

खिलने लगी

चेहरे पे रंगत

दिखने लगी

कोयल की आवाज़

वर्षा की धुन

भौंरे की गुन-गुन

हवा के गीत

झरनों का संगीत

चाँद का आना

सूरज का छिपना

नदी का शोर

खिलखिलाती भोर

अँधेरी रात

तारों के संग बात

जुगनुओं का

ऐसे टिमटिमाना

तितली संग

दूर देश में जाना

गाई धुन को

फिर गुनगुनाना

लिखी डायरी

बार-बार छिपाना

उठती पींगे

सावन के भी गीत

खुशबुओं का

मदहोश करना

सब भाने लगा है।

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