जेठ की धूप

डॉ०भावना कुँअर

बनकर दुश्मन

जलाती तन

बिगाड़े सब रिश्ते।

बाज़ न आती

आग तक लगाती

न घबराती

हैं सब ही पिसते।

पूरे जंगल

धूलतज-धू कर जे

मूक रहते

हर दर्द सहते।

नन्हें -से पौधे

माँगते जब पानी

बनाकर वो

भाप जैसे उड़ाती।

गर्व करती

खूब ही अकड़ती

न ही थकती

पल भर में फिर

गर्म साँसें भरतीं।

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