मेरी प्रीत का चटख रंग

डॉ०भावना कुँअर

पहले रंगो

फिर उतार फेंको

भाये न मुझे

छलिया-सी बहार

पल का प्यार।

समा के रखो तुम

गहराई से

मन के भीतर यूँ

कि टूटे न ये

किसी भी पहरे से

मौसमी प्यार।

भिगोकर जाये यूँ

गहरे तक

मन और तन को,

कड़ी धूप भी

पिघलाए न प्यार।

ऐसे चढ़े ये

प्रीत का पक्का रंग

उतरे न जो

चाहे लाखों हों जन्म

महके यूँ ही

जैसे फूलों के रंग।

दुआ करूँ मैं

तेरी मेरी प्रीत का

चटख रंग

यूँ ही फले औ फूले

मिटा न सकें

दुनिया के ये लोग

बेदर्द बेरहम।

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