नहीं रोती हूँ मैं

 

नहीं रोती हूँ मैं

अगले सावन आने तक

मेह में भीगती हूँ, तब मैं रोती हूँ

कितनी-कितनी देर रोती हूँ

तन गलता है, मन घुलता है

आँसू और बारिश का पानी

सब सच झूठ

पिघलता रहता है

लावा-सा बह

सब शांत हो चुकता है

खाली आकाश तले

पकड़े बादलों का हाथ

फिर शुरू इंतज़ार

अगले सावन आने तक

बिलकुल नहीं रोऊँगी मैं

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One Response

  1. rakesh kumar राकेश कुमार 02/07/2014

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