खिड़कियाँ

खिड़कियाँ

 

लफ़्ज़ों के झाड़ उगे रहते थे

जब तुम थे मेरे साथ

हम दोनों थे हमारे पास

रिश्ते की ओढ़नी थी

लफ़्ज़ों के रंगीले सितारे

टँके ही रहते थे

नशीले आसमाँ  पर…..

फिर तुम चले गए

 

कई बरसों बाद

अचानक एक मुलाक़ात

हम ओढ़नी के फटे हुए

टुकड़ों की तरह मिले

मेरा टुकड़ा

तुम्हारे सड़े टुकड़े के साथ

पूरी न कर पाया वो अधूरी नज़्म

सिसकते टुकड़ों पर फेर लकीर

साँस लेने के लिए

खोल दी है मैंने

सभी खिड़कियाँ

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One Response

  1. rakesh kumar राकेश कुमार 02/07/2014

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