माहिया 37-46

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

 

37

जीवन था चन्दन-वन

ऐसी आग लगी

झुलसा है तन औ मन ।

38

क्या रूप निराले हैं

वेश धरे उजले

मन इनके काले हैं ।

39

उपदेश सुनाते हैं

खुद दुष्कर्म करें

जग को बहकाते हैं ।

40

जनता बेहाल हुई

गुण्डों की टोली

अब मालामाल हुई ।

41

पर निश-दिन कतरे हैं

सच्चे लोग यहाँ

लगते अब खतरे हैं ।

42

अब तक दु:ख झेला है

छोड़ नहीं जाना

मन निपट अकेला है ।

43

यूँ मीत अनेक रहे

मन को जो समझे

बस तुम ही एक रहे ।

 

44

हम याद न आएँगे

जिस दिन खोजोगे

फिर मिल ना पाएँगे ।

45

तुम हमसे दूर हुए

जितने सपने थे

सब चकनाचूर हुए ।

46

उनको सन्ताप हुआ

अनजाने हमसे

लगता था पाप हुआ ।

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