माहिया 25-36

25

साध यही मन में-

तेरी पीर हरूँ

मैं हर पल जीवन में ।

26

जो मुझको दान दिया ।

तुमको पता नहीं

कितना अहसान किया ।

27

मन  को  पढ़ने वाले !

पीर न पहचाने

दिल पे लाखों ताले ।

28

बनजारा मन अपना

बाँध नहीं पाया

हमको कोई सपना ।

 29

तुम थे मेरे सपने

भीड़ -भरे जग में

तुम थे केवल अपने ।

30

हर रुत में खिलना है

जन्मों -सा मौसम

हमको तो मिलना है ।

31

ये जीवन था सोना ,

किसकी नज़र लगी

अब माटी  हर कोना ।

32

 परिभाषा अपनों की

समझ न पाए थे

 पीड़ा हम सपनों  की ।

33

तू  सपने में आया

बिन बात रुलाना

हमको न ज़रा भाया ।

34

पनघट भी प्यासा है

गर ओ बूँद मिले

बचने की आशा है  ।

35

जो मीत हमारे थे

धोखा देने में

दुश्मन भी हारे थे ।

 36

बिन मौत न हम  मरते

तुमने दे डाले

वे घाव नहीं भरते ।

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