सागर क्यूँ खारा है ?माहिया 12-22

12

कल बात कहाँ छोड़ी

सच तक जाती थी

वो राह कहाँ मोड़ी ।

13

नस नस में घोटाला

तन उनका उजला

पर मन कितना काला !

14

कैसे हालात हुए

अब विख्यात यहाँ

श्रीमन् ‘कुख्यात’ हुए ।

15

कट जाए तम-कारा

खोलो वातायन

मन में हो उजियारा ।

16

दो औ‘ दो पाँच नहीं

कहना है कह दे

अब सच को आँच नहीं ।

17

वो पल कब आएँगें

मुदित मना पंछी

जब फिर से गाएँगें ।

 18

हम ऐसे मोम हुए

कल चौराहे पर

कुछ सपने होम हुए ।

19

सागर क्यूँ खारा है ?

मीठी सी नदिया

तन – मन सब वारा है ।

20

कब पास हमारे थे ?

जो दिन रैन बहे

वो आँसू खारे थे ।

21

काँटों से ये कलियाँ

कहतीं-झूमेंगे

हम मस्ती की गलियाँ ।

22

तुम जान न पाओगी

छलिया है मौसम

देखो ,मुरझाओगी ।

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