माहिया-35-51

35

  हम रीत न तोड़ेंगे

  बचपन की यादें

  सीपी में जोडेंगे ।

  36

पुरवा संग आए हैं

 पंछी पाहुन का

 संदेसा लाए हैं  ।

 37

हाथों की रेखा है

 भावी की भाषा

 अनमिट ये लेखा है  ।

  38

पनघट पर मेले हैं

 पाहुन आए ना

 हम आज अकेले हैं

39

वो राग न पूरा है

तुम जो गाओ ना

वो गीत अधूरा है ।

40

पूनम की रात हुई

तारों की झिलमिल

चंदा से बात हुई ।

41

सन्ध्या की वेला है

नीले अम्बर में

तारों का मेला है

42

लहरें क्या गाती हैं

चंदा रोज़ सुने

क्या राग सुनाती हैं

43

अमराई छाई है

खुशबू के झोंके

पुरवा भरमाई है  ।

 44

पागल मन झूम रहा

सावन की बूँदें

अधरों से चूम रहा ।

45

मन को समझाओ तो 

पंछी -सा उड़ता

क्या रोग बताओ तो  ।

46

हर बात छिपाते हो

कैसा रोग हुआ

क्यों वैद बुलाते हो ?

47

छन छन झंकार हुई

पायल तेरी थी

मेरी क्यों हार हुई  ।

48

तुम जीतो तो जानें

छम – छम की भाषा

समझो तो हम मानें  ।

49

मन- पीड़ा झलक गई

नैनों की गगरी

कुछ काँपी, छलक गई ।

50

कंगना क्या बोल रहा

भेद कलाई के

धीमे से खोल रहा  ।

 51

देहरी पर दीप धरूँ

पाहुन  आन खड़े

नैनों में हास भरूँ  ।

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