माहिया 18-34

18

तरुवर की छाया है

मौसम बदलेगा

कुछ दिन की माया है  ।

19

अपनों से डरते हो

अखियाँ बंद  करूँ 

सपनो में सजते हो  ।

20

कितनी हरियाली थी

युवती -सी शोभित

तरु  की हर डाली थी  ।

21

क्यों गुमसुम रहते हो

अधरों पे ताले

मन की ना कहते हो  ।

22

दुख बाँटा करते हैं

पीर घनेरी है

लो साँझा करते हैं  ।

  23

क्या प्रीत निभाते हो

मन की धड़कन को

दिन रात छिपाते हो ।

24

आओ चाँद बुला लाएँ

मन के द्वारे पर

कुछ दीप जला आएँ ।

25

सन्ध्या सिन्दूरी है

इक परदेसी से

मीलों की दूरी है  ।

26

तरुओं पर कलरव है

छेड़ो तान कोई

वीणा क्यों नीरव है  ।

27

प्रीति  सदा प्राण हुई

तेरे नयनों में

सुख की पहचान हुई  ।

28

चहुँ ओर उदासी है

बदली  बरसी ना

नदिया भी प्यासी है

 29

लो बदली बरस गई

  नदिया झूम उठी

  धरती भी सरस गई

 30

नयनों में कजरा है

 पाहुन आन  खडा

अलकों में गजरा है

 31

यह कैसी रीत हुई

 जो चितचोर हुआ

 उससे ही प्रीत हुई

32

कैसी मनुहार हुई

  रूठे माने ना

 दोनों की हार हुई

 33

कागज की नैया है

नदिया गहरी है

अनजान खिवैया है

34

कोयलिया कूक उठी

 सुर तो मीठे थे

 क्यों मन में हूक उठी

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