माहिया 1-17

1

शबनम  के गहने हैं

नभ ने भेजे हैं

धरती ने पहने हैं ।

2

तुम कैसे मानोगे

पीड़ा मौन रही

तुम कैसे जानोगे  ।

3

आँगन की तुलसी है

मेघा ना  बरसे

अकुलाई, झुलसी है  ।

4

परदेसी आए  ना

विरहन की बगिया

कोयल भी गाए ना  ।

5

मोती की कुछ लड़ियाँ  ।

छलकीं नैनों से

यादों की वो घड़ियाँ  ।

6

सावन का फेरा है

सूने नैनों को

यादों ने घेरा है ।

7

वीणा के तार बजे

तुम जो आए हो

रातों को चाँद सजे  ।

8

दिन आस -निरास भरे

धीरज रख रे मन

सपने विश्वास  भरे

 9

सूरज फिर आएगा

बादल छँटने दो

वो फिर मुस्काएगा

10

हर दिवस  सुहाना है

जीवन उत्सव- सा

हँस -हँस के मनाना है

11

दुर्बल मन धीर धरो

सुख फिर लौटेंगे

इस पल की पीर हरो

12

बस आगे बढ़ना है

बाधा आन  खड़ी

साहस से लड़ना है

13

थामो  ये  हाथ कभी

राहें लम्बी हैं

क्या दोगे साथ कभी

14

फिर भोर खड़ी द्वारे

वन्दनवार सजे

क्यों बैठे मन हारे

15

नदिया की धारा है

थामों पतवारें

उस पार किनारा है

 16

हाथों की रेखा है

खींची विधना ने

वो “कल’ अनदेखा है

17

दिन कैसा निखरा है

अम्बर की गलियाँ

सोना -सा बिखरा है

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