यूँ मजहबों में बंट के ना संसार बांटिये SALIM RAZA REWA

!! ग़ज़ल !!
यूँ मजहबों में बंट के  ना संसार बांटिये
कुछ बांटना है आपको तो प्यार बांटिये !

आंगन मे खून कि न बहे नद्दियाँ  कभी
अपने हि घर मे तीर ना तलवार  बाँटिये !

रहने भी दीजे गुंचाओ गुल को इसी तरह
गुलशन हरा भरा है ना श्रंगार  बाँटिये !  

हर धर्म के गुलो से महकता है ये चमन
खंजर चला के आप न गुलज़ार बाँटिये !

जब भी मिलें किसीसे तो दिल खोलकर मिलें 
छोटी सी  ज़िन्दगी  में ना तकरार बाँटिये !

दुनिया से दुश्मनी को मिटाने के वास्ते
लोगो मे भाई चारे का अख़बार बाँटिये !

इंसानियत का है ये तक़ाज़ा की ऐ “रज़ा”
ता उम्र इस ज़माने में बस प्यार बाँटिये !

221 2121 1221 212
shayar salimraza rewa 9981728122

One Response

  1. Dr. D.S.Shrivastava 21/01/2013

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