जज़्बात पर हावी यकीनन धाक हो गयी है

गजल 

जज़्बात पर हावी यकीनन धाक हो गयी है
दिल्ली की सल्तनत बड़ी नापाक हो गयी है ।

नुमाइंदे आवाम के बसते हैं जिस शहर में-
इज्जत-हिफाजत उस शहर की खाक हो गयी है ।

सरकार कहती है अमन है चैन है चारो तरफ-
फिर दामिनी की आबरू क्यों चाक हो गयी है ?

मत करो अब न्याय की उम्मीद उस सरकार से-
जिसकी आग ही इंसानियत की राख़ हो गयी है ।

सोचो, जरा सोचो कि कैसे तख्त पलटा जाएगा-
जिस तख्त से जख्मी हमारी नाक हो गयी है ?

() रवीन्द्र प्रभात 

One Response

  1. yashoda agrawal 30/12/2012

Leave a Reply