जनाजा

जनाजा
कलम लडखडाने लगी है
सच् बोलनेको
लहरें मार रही है
सियाही
पर
लेखक के सामने
यह कटघरा क्यों ?
क्या तुक बैठारहेहो भाई ?
कोइ कह रहा है
छोड दो सच् को
ले लो आशिर्वाद उनकी
खैर
अब तो उतार रहा हुँ
आरति उनकी
उपरी कालम पर ही
उनकी रौब
उनकी कुर्सि
उनकी…….. खैर जाने भी दो
ट्रिन………ट्रिन……….ट्रिन
देखा आया न आशिर्वाद
मेरा भी जवाफ तयार था
मै झुक गया था
टुट गया था
भावुकता और आदर्श को छोड़कर
अपनी कमजोर बाहु
अपनी पिछे की
लम्बी कतारको देख कर
जमिर को छोड
हकिकत मे उतरगया हुँ
हेल्लो……..हेल्लो……
हांजी……..हांजी…….सुनरहाहू जी
ठिक है…….. ठिक है जनाब !!
पहली कालम पर ही ना???????
ठिक है…..ठिक है…….नमस्कार…..
हाँ तो कल देखियेगा
पहली कालम पर ही
जनाजा !!!!!
एक लेखक का
हरि पौडेल

 

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