पीने की महिमा

पीने की महिमा

रात गुजारते हम मैखाने मे,
दिन गुजरता पीने की चाहत मे;
पीते जो खुशीया मनाने,गम को भुलाने,
या दिलवर के लिये,या महफ़िल जमाने,
पीते वह, खोज़कर-पीने के लिये बहाने;
हम पीते अपनी मर्जी से, जीते सिर्फ़ पीने!
पीना शॉक नहीं,आदत से लाचार दिल मेरा,
बिन पीये रात नहीं गुजरती,हो कैसे सबेरा!
लोग जीते कैसे बिना पीये, मैं हैरान?
पीने के बाद तो हो जाते खुदा समान!
पीने वाले साहब का पीने का ब्याखन;
पीने वालों के लिये जैसे गीता का ज्ञान,
धन्य हुवे,पीनेकी-कथा से मिला रस पान|
जो पड़े देकर ध्यान, पीने मे बने महान,
इस ज्ञान को जो धावें पीने का सुख पावें,
पीने के लिये उनका भी मन नहीं घबरावें,
लोक-लाज़, भय-संशय का डर नहीं डरावें
पीने वाला निशंकोच जब मदिरालय जावें!!

सजन कुमार मुरारका

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