यादो की परछाई

यादो की परछाई

यादो के झुरमुट से कोई पत्ता,
उड़ते हुवे आया;
उस पर कुछ धुल जमी थी,
मन है कि मचल पड़ा!
पुरानी स्मृतिया,
आतुर आँख देखे उसे,
न जाने कैसी कैसी याद,
घुमे नज़र मे दिन पुराने,
एक दुसरे का साथ निभाना!
जीने-मरने की कसम,
घर बसाने का सपना,
जानना चाहता कि-
बिछड़ने के बाद,
क्या था जो जोड़े रखा हमे|
मन आज भी तड़पता,
अकेले होकर कभी कभी,
सब के बीच तलाश करता!
पुराने दिन कि –
अटखेलियाँ करती परेशान,
रिमझिम बारिस मे भीगना!
कानो मे गुनगुनाये पैजनीया,
खिलखिलाना,हँसना-हंसाना!
और कितनी कितनी बातें,
लिपट पड़ती बांहों में,
बच नहीं सकता उस से,
अनगिन प्रश्न-सताये,
यादें सिकुड़ कर,
सिमट कर दिल मे,
साथ रहती परछाईं सी!
कब किस बहाने उसका,
धुँध सा फैलाव,फैलता मन मे!
मैं हैरान निगाहों से देखता;
यादो के झुरमुट से कोई पत्ता!!

सजन कुमार मुरारका

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