इन्सानी फ़ितरत

इन्सानी फ़ितरत

अक्सर ऐसा होता किया भला जिसका,
वह ही शक्स बुरा चाहता क्यो उसीका!
शायद तभी कहे नेकी कर दरिया मे डाल,
अज़ब दुनिया, गज़ब है इसका हालचाल ;
सगे रिश्तों की कद्र नहीं, तोहमत जरूर है,
उल्फ़त मे फंस मोहब्बत से शिकवा सरूर है,
इन्सान की कद्र नहीं,इन्सान फ़िर भी कहलाता !
बन फ़रिश्ता यहाँ, इन्सानियत का पाठ पडाता !
सुनने काबिल थी जो बात, सुनता कोई नहीं |
फ़िर न सुननेवाली बात पर नाराज़ होता वही |
शिकवा बुतों से कैसा,मृतकों के शहर मे आवाज़ है!
दुनिया ही तमाशाई,जमाने में हर कोई हरजाई है!
फ़िर भी आदमी नक्शे-मुहब्बत पर चलता क्यों है;
आदमी आदमी से तब मोहब्बत ही करते क्यों है ?
शायद जर्रे-जर्रे दिल में, सन्नाटा और तन्हाई है,
कैसे कर बताऊँ, हल्की सी चाहत इसकी दवाई है|
किसी की प्यारी – निगह को मिले जगह कहीं पे ;
हर दर्द बरदाश्त हो जाये जब ऐसे मे दिल खाली है!
इन्सानी फ़ितरत,खुदाई मे दख़लअन्दाजी करनी है;
ख़ुदा क्या करते,बनाई जो दुनिया,तो उसे चलानी है|

सजन कुमार मुरारका

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