स्वप्न बुनना

स्वप्न बुनना

जब देखता हूँ ;
बिछोने पर बैठी,
हज़ारों फंदे डाल,
बेटे के लिये,जाड़े मे,
क्रोशिए से स्वेटर बुनते!
सोचता हूँ ,बुनती ही क्यों?
बुनती भी हो तो क्या-
स्वेटर या प्यार……!
कोई प्यारा सा सपना,
या भरती होगी रिक्तता,
बुनती होगी स्वयं के अरमान;
तुम्हारे शिथील हाथों से ।
धुन्दली नज़र एनक की,
विक्षिप्त दर्द या वेदना,
समेटती चली आती होगी,
मुख-मंडल पर उत्साह लिये,
अंदर को छिपाकर,
उँगलियों चलती गति मे|
वैसे ही कुछ कहे बिना,
घर की दीवारों को ताककर;
आँचल मे मुहं डापकर,
कह देती हो बिन कहे …..!
सूनी आँखों से आप-बीती,
ठिठुरती सासों की,
सिकुड़ती उम्र की पैनी भाषा!
निद्रा-विहीन बीती रातें,
दुखती रग में,
ठहरा खुरदुरा एकाकीपन;
सिसकता खालीपन,
कभी पूरा न भी हुआ जो स्वप्न;
कैसे देख लेती तुम आँखों से,
सहज याद करके,
महसुश करती मीठास!
जो था तो सही ! रहा नहीं साथ,
मैं भी कभी समझना चाहता-
उस सपने का सहज प्रभाव ,
पर नहीं, .समझ पाता नहीं ।
सुनो, तुम बुनना बंद कर दो!
क्रोशिये के फंदे ,मेरे दिल को जकड़ते,
उन्हें कैसे जोड़ पावगी बुनकर,
जो अलग हो गये…………|
वह सर्द हो गयें है भावना से,
उन्हें सर्दी क्या ठिठुरायेगी ?
किसलिये क्रोशिये से कोशीश!
वृथा स्वप्न बुनने की,
बन्ध करो ! ….कर दो ना ।!
………….
सजन कुमार मुरारका

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