जूते

इन भूरे जूतों ने
तय किए हैं
कितने ही सफ़र !

चक्खा है इन्होंने
समुद्र का खारापन
थिरके हैं ये
पहाड़ी लोकगीत पर
और फिसले हैं
बर्फ की ढलान पर
मेरे संग |

इन्होंने सहर्ष पिया है
मेरे पैरों का पसीना
सही हैं ठोकरें सिर पर
गिरने से बचाया है मुझे
अनगिनत बार |
इनकी छाती पर
पहाड़ी चट्टानों की रगड़ है
इनके घुटनों में दबे हैं
दुर्गम जंगलों के काँटें |

इनकी सिलवटों में दर्ज़ है
मेरी अनगिनत यात्राओं का लेखा जोखा |

मेरे जूतों नें मुझे गढ़ा है
जैसे दुनियाभर के तमाम जूतों ने मिलकर
जोतें हैं खेत
उगाई हैं फसलें
ढोए हैं पहाड़
जीते हैं जंग !

इन बदबूदार जूतों में
दुनियाभर की तमाम
ख़ुशबूदार किताबों से ज़्यादा
इतिहास लिक्खा है |

दो भूरे जूतों ने मुझे पहन रक्खा है
इनके लिए मैं महज़
एक जोड़ी पैर हूँ ||

-Sourav Roy “Bhagirath”

 

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