नित नया किनारा …??

अपने सागर में सिमटी …

अपनी सीमाओं के संग ….

करती है हिलोर ……

 

मिटने को उठती है प्रत्येक उत्ताल लहर …..

क्यों बनाती है …स्वनिर्मित ….

नित नया किनारा …??

 

 

क्षणभंगुरता  जीवन की   ..

जानती है सब ..

फिर भी ..मानती नहीं ….

जिजीविषा से भरी ….

ओज से  उल्लसित  …

लहर रुकती नहीं ….!!

 

 

वेग से उत्फुल्ल  ह्रदय  में …

उछलती थीं प्रबल … मचलती …उमड़ती …घुमड़ती ….

जीवट   भावों सी तरंगें …….

जिस धुरी को छू जाती …

…… बस वहीं  तक  किनारा ……………………………………??

फिर धूमिल ..सागर में ……………..

 

फिर मिटने को उठती है प्रत्येक उत्ताल  लहर …..

बनाती है …स्वनिर्मित .. …

नित नया किनारा …??

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  1. भावना तिवारी Dr.BHAVANA TIWARI 09/06/2013

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