रे ! दुखिया !

 
 
 
रे ! दुखिया !

दुख मे तु रोए !

सुख मे न बोले तु
रे ! दुखिया !
कगनवा झन् झन् करके
सजनवा से झगडे  तु
पिया रुठ गए परदेसवा तो
काहे मन फोडे तु
भिग गई सारी अँखिया
रे ! दुखिया !
मरदवा तु नाही हो
कैसे से पल्ला बाँधा
करम फुटे हमारी हो
नैहर कि धाक दिखाती
अपने पति को कोसते जाति
बिखर गई सब सेखिया
रे ! दुखिया !
काश तु पति को प्यार बरसती
नयन से तेरी दुलार टपकति
पिया भी कभी न रुठता
न नैहर से नाता टुटता
रुठ गई सारी सखिया
रे ! दुखिया !
हरि पौडेल 

 

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