भले लोगो का इस शहर में……….

भले लोगों का इस शहर में
कबसे आना जाना है?
सूनी सड़के, टूटी राहें
लगता सब विराना है
छुप जाते हैं चलते चलते
काली परछाई से जो
आज तो बस किस्मत अंधी है
खूनी मंजर
रोज इशारे करते तूफानों को
आंधी से क्या काम चलेगा
जब मशीन से टकराना है
भीतर भीतर रोज खोखली
आवाजों की बारिश है
टप-टप बूंदे गड्ढे भरती
बाहर सब सूना सूना है
भले लोगों का
इस शहर में कब से आना जाना है
सुनते हैं कुछ बहरे होकर
कुछ गूंगे होकर बोल रहे
कठपुतली सा खेल निराला
जनता के संग खेल रहे
खुद नचाते
नचाते सबको
नटरंग तो एक बहाना है
कुरतों में जाले लग जाते
धोती राग पुराना है
हवादार है जुल्मी कोठी
पत्थर चैकीदार अडे
सिंहासन पर बैठे बुत हैं
रिश्वत तो नजराना है
कारकुन, दीवान खडे़
लुच्चे और लफंगे से
अब हर इंसान का
मतलब….मतलब एक जमाना है

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