नई सुबह….!!

अँधेरे कमरे की

  खिड़की से-

  देख रही थी मैं–

 प्रकृति का करिश्मा….!! ,

 व्योम को निर्निमेष निहारती-

 देख रही थी-

 रात के अंधरे को

  जाते हुए ….

  अरुणिमा को-

पृथ्वी पर आते हुए……..!!

 

 

भाग रही है पृथ्वी निरंतर ……..

कुछ पाने को ….

क्या पाने को ?

हर पल, पल खोते हुए !!

फिर भी —-

सुबह के आने को

 कौन रोक सकता है ?

सूरज की आभा को

 कौन रोक सकता है ?

 

बंद हों मन के द्वार –

फिर भी —

सुबह के आने को

 कौन रोक सकता है ?

सूरज की आभा को-

 कौन रोक सकता है ?

 

सूरज की पहली किरण से

मन की सरिता में

 स्पंदन हो ही जाता है —

निष्प्राण निस्तभ्ध शरीर में

 प्राण आ ही जाते हैं …..!!-

उठो जागो-

 खोलो मन के द्वार —-

एक नई सुबह ने

घूँघट खोल दिया है-

One Response

  1. baba saheb landge sarthi 20/12/2012

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