धार बनी नदिया की ….!!

छवि मन भावे …

नयन   समावे ..

सूरतिया पिया की …

 

बन बन .. ढूँढूँ ..

घन बन  बिचरूं …..

धार बनी नदिया की …….

 

 

कठिन पंथ …

ऋतु  भी अलबेली ….

बिरहा मोहे सतावे …

 

पीर घनेरी …

जिया नहीं बस में …

झर झर झर अकुलावे …..

 

 

 विपिन घने ,

मैं कित मुड़ जाऊँ …

कौन जो राह सुझावे …..?

 

डगर चलत नित

बढ़ती हूँ……..

निज वेग मोहे हुलसावे …

 

अब..कौन गाँव  है ….

कौन देस है ..

कौन नगरिया  पिया की ….

 

 

बन बन .. ढूँढूँ ..

घन बन  बिचरूं …

धार बनी नदिया की …….

 

 

धार बनी नदिया की ….!!

 

मैं इक पल रुक ना पाऊँ….

मैं  कल  कल बहती छल छल बहती …..

बहती बहती जाऊँ….!!!!!!

 

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