निर्मल निर्लेप नीला आकाश …

निर्मल निर्लेप नीला  आकाश …

देता है वो विस्तार …..

कि तरंगित हो जाती है कल्पना …

नाद सी…….हो साकार ….

 

अकस्मात  जब ढक लेते हैं  बादल …

नीलांबर  का वो नयनाभिराम  सौन्दर्य …..

निर्गुण को सगुण …..

गुण को गुणातीत …

तत्व को तत्वातीत……

अगम्य को गम्य कर त्वरित गति  देती हैं …

मन की अनहद उन्माद तरंगें …!!

 

आस्था और विश्वास से भरी ……..

मूक सर्जना  मुखरित हो  उठती है …..

पंगु शब्द भी –

कविता में नृत्य करते  है …

मौन तरंगित हो ……

अनहद सा ले जाता है …

मेरे मन को उस पार …….

हे ईश …तुम्हारे पास …..!!

 

अक्षर के अक्षत चढ़ाऊँ  ….

प्रसाद पाऊँ …..सुकृत हो जाऊँ…..

हे प्रभु …तुम्हारा रूप ….मेरे आखर ….

 

निर्मल निर्लेप आकाश …

देता है वो विस्तार …..

कि तरंगित हो जाती है कल्पना …

हो साकार ….

Leave a Reply