कवित्त

चिर निद्रा से मति जागो देखो पीछे मुड़कर।
हमारी विजय की सुगंध महक रही है।
समय के हर एक सोपान पर अभी तक,
पद चिन्ह हमारे पड़े नहीं हैं।
आलस्य तन मन से हटाकर पहचाना,
जयकार गुंजती थी जिसकी हम वही हैं।
जग जान चुका,जग मान चुका ये सच है,
तुम्हें संदेह क्यों है,ये अमित ने बात कही है।