हार कर रुकना नहीं ग़र तेरी मंजिल SALIM RAZA REWA

!! ग़ज़ल !!

हार कर रुकना नहीं ग़र तेरी मंजिल दूर है
ठोकरें खाकर सम्हलना वक्त का दस्तूर है

हौसले के सामने तक़दीर भी झुक जायेगी
तू बदल सकता है क़िस्मत किसलिए मजबूर है

आदमी की चाह हो तो खिलते है पत्थर में फूल
कौन सी मंजिल है जो इस आदमी से दूर है

ख़ाक का पुतला इंसा ख़ाक में मिल जाएगा
कैसी दौलत कैसी शोहरत क्यों भला मगरूर है

वक्त से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता कभी
वक्त के हाथो यहाँ हर एक शै मजबूर है

देखना इक रोज़ खुद मंजिल का आएगा सलाम
कौन कहता है” रज़ा “मंजिल बहुत ही दूर है

shayar salimraza 9981728122