चुप लहरें ( सेदोका)

डॉ हरदीप कौर सन्धु

1

टिमटिमाते 

तारों -भरा अम्बर 

जोड़कर खाट को 

छत पे सोएँ 

ठण्डी -ठण्डी हवाएँ 

ज्यों लोरियाँ सुनाएँ 

2

गाँव की गली 

हाँक  दे बनजारा  

रंगीन चूड़ियाँ लो !

पहने गोरी

नाज़ुक कलाई में

छन -छन छनकी

3

मृग– नयन 

धारीदार काजल 

ज्यों आँज मटकाए

खिलता जाए 

चाँद– सा ये मुखड़ा 

ओढ़े हुए चाँदनी 

4

ठण्डी फुहारें 

सुरमई बादल

आए लेके  संदेसा 

आ गई वर्षा

पुलकित है धरा 

अम्बर भी मुस्काया  ।

5

चुप लहरें

साथ अपने लाईं 

हँसी खिलखिलाती 

मन एकाकी 

फूल सा खिल जाए

गीत  गुनगुनाए 

6

चुप नदी से 

पी लूँ दो बूँद पानी

बुझे प्यास रूहानी

यूँ थामे हुए

लहरों का आँचल

मन बहता जाए

7

याद हैं दिन

जब माँ के आँगन 

सपने थे उगते

जी चाहता था

उडूँ दूर गगन

बिन पंख लगाए

8

दूरी न रही

मंजिल थी सामने

कोई रास्ता न मिला

ढूंढ़ते रहे

ताउम्र हमें  कोई 

रहनुमा न मिला

9

बूँद- कतरा 

लिये हुए तूफ़ान

अम्बर से गिरती 

मिलती बूँदें 

अगर नदिया से 

धारा बन बहती 

10

बिन पत्तों के

वृक्ष खड़े उदास 

कोई नहीं है पास 

धूप बसंती

हरी कोंपलों बुनी 

पोशाक पहनाती

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