पिता का रुतबा

 

कलम स्याही
बार-बार करती
माँ का ही ज़िक्र
हर पन्ना सजाएँ
पिता की बात
भला क्यों नहीं होती
ये तो बताएँ
ममता की मूरत
माँ प्रेम – देवी
माने जहान सारा
बिन पिता के
घर -परिवार का
कहाँ गुजारा
पकड़कर हाथ
नन्हे -मुन्नों का
चलना वो सिखाए
पिता का जूता
बेटे को जब आए
मित्र बेटे का
खुद वो बन जाए
पहली रोटी
जब बेटी पकाए
चाहे हो कच्ची
पिता को वो लगती
पकवानो से
बहुत ज्यादा अच्छी
पिता का नाम
जीवन किताब के
पन्ने -पन्ने पे
जगमगाए  लिखा
कौन है जो ले
बच्चों के जीवन में
पिता का वो रुतबा !

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