दोहे

1

दीपक बाती से कहे ,तुम पाओ निर्वाण ।

मेरी भी चाहत जलूँ ,जब तक तन में प्राण ।।

      2

कटते -कटते कह रही,वन के मन की आग ।

कैसे गाओगे सखा ,अब सावन का राग ।।

       3

संग हँसें रोंयें सदा, नहीं मिलन की रीत ।

प्रभु मेरी तुमसे हुई, ज्यों नैनन की प्रीत ।।

         4

सुवर्ण मृग  की लालसा ,छीने सुख सम्मान ।

 किस्मत ने  उनका लिखा,जीवन दुख के नाम ।।

       5

जब लालच की आग को ,मन में मिली पनाह ।

बेटी का आना यहाँ, तब से हुआ गुनाह ।।

    6

सुख की छाया है कभी ,कभी दुखों की धूप ।

देख भी लो नियति – नटी, पल- पल बदले रूप ।।

   7

पावनता पाई नहीं ,जन मन का विश्वास ।

राम राज में भी मिला ,सीता को वनवास ।।

  8

मधुर मिलन की चाह मन ,नैनन दर्शन आस ।

कौन जतन कैसे घटे , अन्तर्घट की प्यास ।।

9

दुनिया के बाज़ार में , रही प्रीत अनमोल ।

ले जाये जो दे सके , मन से मीठे बोल ।।

10

कल ही थामा था यहाँ,दुख ने दिल का हाथ ।

आकर ऐसे बस गया ,ज्यों जनमों का साथ ।।

11

आहट तक  होती नहीं ,सुख के इस बाज़ार ।

हम भी दुख की टोकरी ,लेने को लाचार ।।

12

सागर ,सुख दुख की लहर , ये सारा संसार ।

मेरी आशा ही मुझे , ले जायेगी पार ।।

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