श्वेतपरी…

श्वेतपरी

ओ श्वेतपरी !
हैं आँखें तेरी मदभरी
क्यों स्वर्गपुरी से
उतर अवनि पर आयी री,
                    ओ श्वेतपरी !
मैं थका दिन का श्रमी
बैठ तरु की शीतल छाँव
पोंछ रहा था सीकर अपने
ज्यों बंद हुईं मेरी पलकें
देखा मैंने एक सपना,
“व्योम-मार्ग से उतर आ रही…
                                एक परी ।”
करने लगी निवेदन,
“दे दो न अपना तन-मन
उठो-उठो चलो श्रमी
अपने पंखों पर बिठाकर
ले चलूँ तुझे मधुपुरी ।”
कहा मैंने, “नहीं-नहीं
घर में बच्चे भूखे होंगे
प्रतीक्षा में नयन पसारे होंगे
रूखे-सूखे खाते होंगे
समझो मेरी मज़बूरी
दे दो मुझको हलवा-पुरी ।”
“तथास्तु !” कहकर फौरन
उड़ गयी गगन में
श्वेतपरी ।

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