काटकर लकड़ियाँ जो रोज बेचता है…

काटकर लकड़ियाँ जो रोज बेचता है

वो लकड़हारा भी ख्वाब देखता है

 

बाँधकर लकड़ियाँ सपने सँजोया उसने

हर वक्त, हर मौसम बदन पे झेलता है

 

बिक जायेंगी लकड़ियाँ शाम ढलते-ढलते

तभी तो दरबदर वो घुटने टेकता है

 

देखा न किसी ने जलती हुई चिता को

अस्थियाँ जो अपनी, हाथों समेटता है

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