दोहे – पर्यावरण

1

पंछी-पंचायत जुड़ी, सभी जीव बेहाल ।

मानव ने दूषण किया ,जीना हुआ मुहाल । ।

2

वायु प्रदूषित कर रहा , तनिक न आती लाज ।

रे मानव तू है बना , दानव का सरताज । ।

3

नदिया थी संजीवनी , कैसा तू बे पीर ।

कचरा ,मैला भर दिया , मलिन किया है नीर ॥

4

पानी पीकर चंचु भर, पाखी तो उर जाय ।

मानव लिप्सा  देख लो ,पानी व्यर्थ बहाय । ।

5

मानव कितना है कुटिल ,मन में नहीं लजाय ।

माता को दूषित करे , धरती है निरुपाय । ।

6

हर खिड़की तो मूँद ली ,भर-भर पाथर ,ईंट ।

गौरैया घर छीन के, पड़ी खून की छींट । ।

7

करें बसेरा पेड़ पर, उड़ें खुले आकाश ।

धरती मैली ना  करें, थोड़े जल की आस । ।

8

चादर में ओज़ोन की , बढ़ता जाता छेद ।

ए सी तेरे सिर चढ़ा , आँख चढ़ी है मेद । ।

9

नीम-गाछ की सारिका, चह-चह करती भोर ।

घटी सूर्य की रोशनी, मचा शहर में शोर । ।

10

कागा पण्डित जी  कहें , ‘’अशुभ चल रहा दौर ।

आश्विन बरसा कोहरा , माघ आ गया बौर ॥‘’

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