स्वप्न-गीत

स्वप्न-गीत

प्रात: का स्वप्न आज सत्य सा प्रतीत हुआ,

नयन खुले, सपन टूट क्षण में अतीत हुआ,……………..

यामिनी को साथ पाके,

चन्द्र-आभ प्रखर  थी,

दबे पाँव आईं तुम,

नीरवता मुखर थी,

भाता कभी न था जो अँधियारा रात का ,

आज मिलन बेला में, मन का वो मीत हुआ,………………

.प्रात: का स्वप्न आज…………………

 

संकुचाई तुम भी थी, और

मै भी मौन-मौन था,

हाथों में जब हाथ आया ,

सारा विश्व गौण था ,

 

झींगुर का कर्कश स्वर,जो बरछी सा लगता था,

देख तुम्हे सामने ,जीवन का  गीत हुआ,…………….

प्रात: का स्वप्न आज………………….

 

लज्जा के आभूषण तब,

मोम से पिघल गए,

तन मन हम प्रेमियों के

पारे जैसे    मिल गए,

आवेशों के मेघ उमढ़े, प्रीत के आकाश पर,

बरस गए मरुथल  पर,पल में  सब  शीत  हुआ…………..

प्रात: का स्वप्न आज…………………

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