अपना मन

 अपना मन तो बिल्कुल जोगी

   जंगल और वीराना क्या ।

  भीड़ नगर की नहीं खींचती

 महलों का मिल जाना क्या।।

  फुटपाथों पर नींद थी आई

 

  गद्दों पर हम रातों जागे।

   माया भागी पीछे­ पीछे

   हम तो भागे आगे आगे।।

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