लौटो

तुम लौटो, देखो यादों की गिरहें कैसे खुली हैं,

ये सांस रुके तो जिंदगी को सांस आये,
तुम्हारे लम्हों की उम्र ज्यादा हो |
तुम्हारी हंसी बिखर जाती थी
हरी घास पे यूँ,
यूँ ही मैं कभी वो हंसी समेटकर
अपने परिधान तृप्त कर देता था

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