शायद मैं?

कौन चुका पाया रिश्तों की कीमत को,

अच्छे बुरे को कौन पहचान पाया,
इंसान तो बस काठ की नौका में खुद
को तैरता पाया।
देखो तो तारे सीमान्त हैं जितने,
पर रौशनी की काया उतनी छोटी,
जैसे एक सूरज सब पे भारी।
माना की आकाश का अवलंबन,
हो मृत्यु पश्चात् ही पूरा,
इस एक दिवा के जीवन में,
तुमसे लाख विरह भी देखा।

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