रहगुज़र

रहगुज़र

जीवन की रहगुज़र पे कितनी दूर चला आया हूँ

बस्तियां  कितनी, शहर , कितने  छोड़ आया हूँ,1

ज़मीं  से  अर्श  तक,  छाई   हुई है धुंद  ही  धुंद ,

मैं  अपने  पीछे  सुबहो-शाम छोड़ आया  हूँ ,2

सरे-नज़र   न   कोई,   ना  हीं  तसव्वुर में    कोई

मैं हरेक  चेहरा  ,हर   मुलाक़ात  छोड़  आया  हूँ 3

अकेला यूँ   भी   था , अब और भी हो गया हूँ तनहा

साथ   मेरे  जो था वो साया    छोड़ आया हूँ  4

मतला मुहब्बत की ग़ज़ल का ना मिला जब कोई

हार के  खुद से , फकत  मक्ता छोड़ आया हूँ , 5

गुरूर करने दो दुनिया को अपने दस्तूरों  पे ‘असर’

मैं उस के   सारे   रस्मो -रिवाज़   छोड़ आया हूँ 6

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