नभ से पूछो

नभ से पूछो

बिछुड़ने का दर्द

सहता है जो

हर काली रात में

कब से टंगा

औंधा, अकेला, मौन

मुद्दत हुई

एक वही कहानी

कोई न कोई

प्यारा उसका तारा

सदा के लि

फूलझड़ी बिखरा

जुदा हो जाता

साक्षी बना असंग

मूक, निरीह !

टूटने का दु:ख भी

चुप सहता

थोड़ी देर जलता

फिर राख हो जाता

कुल पंक्ति 19

12-खोई है धुन

संगिनी खोई

वृद्ध विधुर अब

रहा अकेला

एकाकी जीवन का

दर्द झेलता

कौन यहां जो पूछे

मन की पीड़ा

चुप–चुप दहता

गूंगा बन वो

निज मर्म–व्रणों से

रहे खेलता

चोटिल तन–मन

बच्चे उसके

मस्त–व्यस्त रहते

निज नीड़ों में

अब घुटता दम

अंधकूप में

रहे वह भीड़ों में

कटते नहीं

जीवन साथी बिन

उदास दिन

टूटी–फूटी बाँसुरी

पड़ी, खोई है धुन 

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